आज मैंने सोचा, एक नया धर्म बनाऊँ, ठीक वैसे ही जैसे महावीर, बुद्ध, नानक या मोहम्मद आदि ने बनाये| क्यूँ….? क्यूँ अरे हर्ज़ ही क्या है, जब हर एक धर्म अपने नाम की डंका पीटते हैं
तो एक नया ही धर्म क्यूँ नहीं| मसलन कोई बाबा या मौलवी या अन्य धर्म के पेशकार कहते है कि मानव जाति की उत्पत्ति उनके उनके धर्म से हुई है या फिर यहाँ पैदा हुए तो इस धर्म के वहां हुए तो उस धर्म के| अगर ऐसा है तो उत्पत्ति शब्द कहाँ से आया, मैं सोच में पड़ गया । कई ऐसे लोग हैं जो कहीं पैदा हुए तो उनके बच्चे कहीं और किसी दूर देश में , अब इनके धर्मो का फैसला कैसे हो
? पोशम्पा भाई पोशम्पा , धर्म के पेशकारों ने क्या किया, राजनीति की घड़ी चुराई........|
अरे ये मैं कहाँ चला गया, मुझे वापस आना होगा, मुझे तो एक नया धर्म बनाना था| आज तो मैं एक धर्म बना के ही रहूँगा भले ये आज कुछ वर्षों का क्यूँ न हो। राह थोड़ी मुश्किल होगी …, अरे नहीं, किसी और की वजह से नहीं , खुद की वजह से । ना जाने कब मैं थक जाऊं या बोर हो जाऊं| फिर भी कोशिश करता हूँ , शायद वो दिन आ ही जाये एक नए धर्म का । हाँ उसके बाद राहें थोड़ी मुश्किल हो सकती हैं| अरे इस बार मेरी वजह से नहीं, दूसरों की वजह से जिन्होंने राजनीति की घड़ी चुराई है| अब घड़ी भी ऐसी वैसी तो है नहीं, हर फैसले की छड़ी तो उनके पास चली गई है| तो मतलब
.... , तब तो जेल में मुझे जाना पड़ेगा , जेल की रोटी खानी पड़ेगी , जेल का पानी पीना पड़ेगा। लो मैं फिर भटक गया । सच ही कहते हैं, काम न काज का ……। अब लोग जो भी कहे , चल कर कुछ रोटी खा लूँ, ना जाने कब जेल की खानी पड़ जाये|
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